शुक्रवार, 6 अगस्त 2010
इनकी कौन सुनेगा...!
आजादी दिलाने वाले बुजुर्ग हो चुके स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपने आपको मिलने वाली राशि के नाम परिवर्तन के लिए छह दशक से चिल्ला रहे हैं लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। जनप्रतिनिधि सांसद, विधायक, पार्षद सभी अपने मानदेय को बढ़ाने के लिए खुद ही निर्णय ले लेते हैं मगर गुलाम देश में अंग्रेजों का जुल्म सहने व गुलामी से मुक्ति दिलाने वालों के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं। इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सालाना जो राशि मिलती है वह भी बेहद कम है जो न्यूनतम कलेक्टर द्वारा निर्धारित मजदूरी दर के आसपास है। जबकि एक सांसद अपना वेतन सालाना 10 लाख रुपए तक करा रहा है तो विधायक और पार्षद भी दिन ब दिन वेतन को बढ़ाए जा रहे हैं। आजाद के लिए जुझने वाले हमारे बुजुर्ग हो चुके स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए आखिर अब कौन आवाज उठाएगा? जबकि इन संख्या आज बहुत कम हो चुकी है।
मंगलवार, 27 जुलाई 2010
मंत्रीजी का मनोरंजन..देश की उम्मीदें
फिल्में लोगों के मनोरंजन का साधन होती हैं। मगर खट्टा मीठा फिल्म ने केंद्रीय मंत्री कमलनाथ की आंखें खोल दी। उन्हें फिल्म से पता चला कि सड़क बनाने वाले ठेकेदार को कितने स्थानों पर हिस्सा देना होता है। फिर कहीं जाकर सड़क बनती या उसकी मरम्मत होती है। यही वजह है कि देश के सड़क मार्गों की स्थिति बनने के कुछ समय बाद ही कैसी हो जाती है यह किसी से छिपा नही है। मंत्रीजी तो हवाई यात्रा ज्यादा करते हैं और जहां सड़क से जाते हैं वहां उनके आने-जाने की सूचना पर ही सड़क दुरुस्त हो जाती है। देखना यह है कि मंत्रीजी की आंखें खुलने के बाद अब क्या सड़कों की हालत सुधरेगी या ठेकेदारों के हिस्से बांटने से बची राशि से ही मार्गों का जीर्णोद्धार होता रहेगा। ठेकेदारों से हिस्सा लेने वालों की संख्या कम होगी या उसमें कुछ हिस्से और बढ़ जाएंगे। अगर हिस्से बढ़ जाएंगे तो देश की सड़कों पर डामर तलाशना मुश्किल हो जाएगा।
रविवार, 25 जुलाई 2010
बहनों के भैया, लड़कियों के मामा...कुछ करो
ग्वालियर शहर में इन दिनों अपराधियों और असामाजिक तत्वों का बोलबाला है। लुटेरे-चोर जहां वारदातें कर समाज में लगातार अपना आतंक फैलाने में कामयाब हो रहे हैं। वहीं समाज के तथाकथित दबंग सरेआम वारदातें कर अपने क्षेत्र में दबदबा बढ़ा रहे हैं। पुलिस के आला अफसरों के ठिकानों (दफ्तरों) और थाने-पुलिस चौकी के आसपास ही अपराधी और दबंग गोलियां चला रहे हैं तो अवैध कारोबार कर रहे हैं। हालत यह है कि चोर-उचक्के पुलिस अफसरों के घरों को भी नहीं छोड़ रहे।
अपराधियों और तथाकथित दबंगों के खिलाफ पुलिस की सख्ती कहीं दिखाई नहीं देने से अब लोगों ने स्वयं अपराधियों से लोहा लेना शुरू कर दिया है। इसमें महिलाएं अब आगे हैं। यही नहीं पुलिस के प्रति लोगों का गुस्सा इतना है कि महिलाएं खुलेआम लाठियां उठाकर पुलिसकर्मियों को ही धमकाने लगी हैं। दबंगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने का सिलसिला बेलागांव से शुरू हुआ है जिसमें एफआईआर में दर्ज नामों छोड़ पुलिस ने विवेचना के आधार पर दूसरे लोगों को जेल भेज दिया। यही नहीं गिरफ्तार डेढ़ दर्जन अपराधिक रिकार्ड वाले असामाजिक तत्व की थाने में खुलेआम मेहमान नवाजी की गई। फिर माधव नगर में जिला पंचायत अध्यक्ष सत्यपाल सिंह सिकरवार के खिलाफ एक रेत ठेकेदार के घर गोलियां चलाने का मामला आया तो पुलिस अब तक उसे भी तलाश नहीं कर पाई।
दबंगों के पुलिस गिरफ्त में नहीं को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि पुलिस कहीं न कहीं राजनीतिक दबाव में काम कर रही है। इससे पुलिस का मनोबल कुछ गिरता नजर भी आ रहा है। इसके लिए आला अफसरों को प्रयास करने की जरूरत है। रात्रि गश्त के लिए पुलिस कप्तान को थानों को चेताना होगा। वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी इस स्थिति की समीक्षा कर मनोबल बढ़ाने के लिए कोई संदेश भेजना चाहिए।
अपराधियों और तथाकथित दबंगों के खिलाफ पुलिस की सख्ती कहीं दिखाई नहीं देने से अब लोगों ने स्वयं अपराधियों से लोहा लेना शुरू कर दिया है। इसमें महिलाएं अब आगे हैं। यही नहीं पुलिस के प्रति लोगों का गुस्सा इतना है कि महिलाएं खुलेआम लाठियां उठाकर पुलिसकर्मियों को ही धमकाने लगी हैं। दबंगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने का सिलसिला बेलागांव से शुरू हुआ है जिसमें एफआईआर में दर्ज नामों छोड़ पुलिस ने विवेचना के आधार पर दूसरे लोगों को जेल भेज दिया। यही नहीं गिरफ्तार डेढ़ दर्जन अपराधिक रिकार्ड वाले असामाजिक तत्व की थाने में खुलेआम मेहमान नवाजी की गई। फिर माधव नगर में जिला पंचायत अध्यक्ष सत्यपाल सिंह सिकरवार के खिलाफ एक रेत ठेकेदार के घर गोलियां चलाने का मामला आया तो पुलिस अब तक उसे भी तलाश नहीं कर पाई।
दबंगों के पुलिस गिरफ्त में नहीं को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि पुलिस कहीं न कहीं राजनीतिक दबाव में काम कर रही है। इससे पुलिस का मनोबल कुछ गिरता नजर भी आ रहा है। इसके लिए आला अफसरों को प्रयास करने की जरूरत है। रात्रि गश्त के लिए पुलिस कप्तान को थानों को चेताना होगा। वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी इस स्थिति की समीक्षा कर मनोबल बढ़ाने के लिए कोई संदेश भेजना चाहिए।
शनिवार, 24 जुलाई 2010
कपड़ों की तरह बदलते रिश्ते....

उच्च वर्ग के लोगों में कपड़ों की तरह रिश्ते बदलते हैं। इसका ताजा उदाहरण क्रिकेटर अजहरुद्दीन का है। उन्होंने नौरीन से पहली शादी और उसे छोड़कर फिल्म अभिनेत्री संगीता बिजलानी को 14 साल तक रहे। अब उनका मन बिजलानी से भर गया है और बैड़मिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा से उनकी नजदीकी बढ़ रही है।
47 साल की उम्र में तीन शादी करने वाले अजहरूद्दीन को इसके लिए कोई गिला शिकवा भी नहीं है। उत्तरप्रदेश से कई लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व कर लोकसभा पहुंचे अजहरूद्दीन की इस शादी पर दोनों पक्षों ने कोई सकारात्मक टिप्पणी नहीं की है लेकिन समाचार पत्रों ने यह खुलासा किया है कि एक सप्ताह में दोनों विवाह कर लेंगे। तथाकथित उच्च वर्ग के लोगों के इन रिश्तों की खबरों को अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है जबकि इन समाचारों को कुछ दबाकर प्रकाशित किया जाना चाहिए। इससे भारतीय संस्कृति पर दिन ब दिन विपरीत असर पड़ रहा है। हमारी संस्कृति आज मध्यम वर्ग के लोगों के कारण ही कुछ हद तक बची है और जब ऐसे उदाहरण उनके सामने प्रस्तुत किए जाएंगे तो फिर वे भी उसी धारा में बहने लगेंगे। ऐसे लोगों को रिश्तों के साथ मजाक करने से रोकना भी चाहिए।
शुक्रवार, 23 जुलाई 2010
तीन करते हैं जनता का प्रतिनिधित्व...
अपने हितों नेता हमेशा ध्यान रखते हैं फिर चाहे डीजल-पेट्रोल पंप लेने का मामला हो या दूसरी सरकारी एजेंसी या ठेके लेने-देने का। और तो और जब भी वेतन बढ़ाने की बात आती है तो ये उसे लेने में पीछे नहीं हटते। इनके हाथ में सारे फैसले लेने का अधिकार होता है तो फिर इनके प्रस्ताव पर कोई देरी नहीं होती। फटाफट निर्णय हुआ और अमल शुरू यानि चट मंगनी पट शादी। मगर ऐसे स्वहितों के परे हटकर काम करने वाले भी कुछ नेता होते हैं मगर उनका प्रतिशत नगण्य होता है। वास्तव में ये लोग ही जनता के सही प्रतिनिधि होते हैं।
ऐसा ही एक अजूबा असम विधानसभा में देखने को मिला। असम विधानसभा में विधायकों ने अपने वेतन भत्तों में जिस तरह से 400 फीसदी बढ़ोतरी की है वह नेताओं की स्वहित नीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। मगर सवा सौ विधायकों की विधानसभा में तीन ऐसे भी विधायक मिले हैं जिन्होंने 400 फीसदी वेतन वृद्धि का विरोध किया है।
समाज को ऐसे विधायकों का सम्मान करना चाहिए। समाचार पत्रों को भी ऐसे लोगों के नाम प्रकाशित करने थे क्योंकि ये वास्तव में जनता की आवाज उठाने का काम कर रहे हैं। कुछ अखबारों ने इनकी संख्या तो दी है मगर नाम किसी ने भी प्रकाशित नहीं किए। जनता को कम से कम इनके नाम पता चल सकें यह तो समाचार पत्रों को करना ही चाहिए।
ऐसा ही एक अजूबा असम विधानसभा में देखने को मिला। असम विधानसभा में विधायकों ने अपने वेतन भत्तों में जिस तरह से 400 फीसदी बढ़ोतरी की है वह नेताओं की स्वहित नीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। मगर सवा सौ विधायकों की विधानसभा में तीन ऐसे भी विधायक मिले हैं जिन्होंने 400 फीसदी वेतन वृद्धि का विरोध किया है।
समाज को ऐसे विधायकों का सम्मान करना चाहिए। समाचार पत्रों को भी ऐसे लोगों के नाम प्रकाशित करने थे क्योंकि ये वास्तव में जनता की आवाज उठाने का काम कर रहे हैं। कुछ अखबारों ने इनकी संख्या तो दी है मगर नाम किसी ने भी प्रकाशित नहीं किए। जनता को कम से कम इनके नाम पता चल सकें यह तो समाचार पत्रों को करना ही चाहिए।
बुधवार, 21 जुलाई 2010
आग में डाला घी.....
राजनीति में महिला पंच हो या सरपंच या पार्षद या फिर विधायक, अधिकांश के पति उनकी तरफ से सक्रिय रहते हैं। गाहे ब गाहे पुरुष नेता इन महिला जनप्रतिनिधियों के पतियों के दैनदिनी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करते और फिर अंतर्विरोध शुरू हो जाते हैं। मगर पार्टी नेता विवाद को समय समय पर शांत करते रहे हैं। इस बार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने शांत करने के बजाय इसमें घी डालने का काम किया है।
ग्वालियर में लंबे समय से चल रहे पार्षद पति विवाद को लेकर कई स्तर पर चर्चा हुई। पहले महापौर ने मनाने की कोशिश की, फिर भाजपा जिला मंत्री ने भोज पर बुलाकर सामंजस्य बैठाने के प्रयास किए। ये प्रयास बेकार साबित हुए और विवाद का निराकरण नहीं हुआ। इसी बीच संगठन के प्रदेश प्रमुख और सांसद प्रभात झा ने जिला स्तर की एक बैठक की। इसमें पार्षद पतियों को साफ तौर पर अपनी पार्षद पत्नियों से दूर रहने को कहा। उन्हें स्वतंत्र होकर राजनीति करने की हिदायत दी। उनके इस बयान से पार्षद पतियों में और ज्यादा गुस्सा है। कुछ का कहना है कि हमने अपनी दम पर पत्नियों को जिताया है। फिर हम उनकी राजनीति से दूर करने का अधिकार किसी को नहीं है। जनता को हमें जवाब देना है। देखना यह है कि इस राजनीति बयान से पार्षद पतियों, उनकी पत्नियों के बीच दूरी बढ़ती है या महापौर से उनके रिश्तेदार मधुर बनते हैं। मगर पार्टी के प्रदेश प्रमुख का यह बयान महापौर, पार्षद पति- पत्नी विवाद को शांत करने के स्थान पर बढ़ाने में ज्यादा भूमिका निभाएगा, यह संकेत मिल रहे हैं।
ग्वालियर में लंबे समय से चल रहे पार्षद पति विवाद को लेकर कई स्तर पर चर्चा हुई। पहले महापौर ने मनाने की कोशिश की, फिर भाजपा जिला मंत्री ने भोज पर बुलाकर सामंजस्य बैठाने के प्रयास किए। ये प्रयास बेकार साबित हुए और विवाद का निराकरण नहीं हुआ। इसी बीच संगठन के प्रदेश प्रमुख और सांसद प्रभात झा ने जिला स्तर की एक बैठक की। इसमें पार्षद पतियों को साफ तौर पर अपनी पार्षद पत्नियों से दूर रहने को कहा। उन्हें स्वतंत्र होकर राजनीति करने की हिदायत दी। उनके इस बयान से पार्षद पतियों में और ज्यादा गुस्सा है। कुछ का कहना है कि हमने अपनी दम पर पत्नियों को जिताया है। फिर हम उनकी राजनीति से दूर करने का अधिकार किसी को नहीं है। जनता को हमें जवाब देना है। देखना यह है कि इस राजनीति बयान से पार्षद पतियों, उनकी पत्नियों के बीच दूरी बढ़ती है या महापौर से उनके रिश्तेदार मधुर बनते हैं। मगर पार्टी के प्रदेश प्रमुख का यह बयान महापौर, पार्षद पति- पत्नी विवाद को शांत करने के स्थान पर बढ़ाने में ज्यादा भूमिका निभाएगा, यह संकेत मिल रहे हैं।
जब सपोर्ट तो कार्रवाई क्यों नहीं...
भारतीय जनता पार्टी अपने दोहरे चरित्र को लेकर गाहे ब गाहे सामने ले आती है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भूमाफियाओं के प्रदेश में दबदबे को लेकर दिए गए बयान से आए राजनीतिक भूचाल पर पार्टी हाईकमान ने मुंह तो खोला लेकिन केवल चौहान के बयान को सही बताने के लिए। उन्होंने अपने बयान में चौहान की हिम्मत यह कह कर नहीं बढ़ाई कि वे भूमाफिया के खिलाफ सख्त फैसला लेकर कार्रवाई करें। अगर हाईकमान वाकई में कोई एक्शन लेने की बात कहता तो शायद पार्टी की जनता में एक स्वच्छ छवि बनकर जाती।
मुख्यमंत्री के भूमाफिया के पैसे एकत्रित कर उन्हें हटाने की साजिश रचने के शिवपुरी में दिए गए बयान से आए भूचाल का असर विधानसभा में दिखाई देने लगा है। इस कारण दो दिन से मप्र विधानसभा चल नहीं पा रही। कांग्रेस लगातार इस बयान पर बहस के लिए अड़ी है तो सत्तारूढ़ दल के विधायक इस पर राजी नहीं है। उलटा उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी पर कांग्रेस की टिप्पणी को लेकर वे विपक्ष को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच दिल्ली में भाजपा के राजीव प्रताप रूढ़ी ने शिवराज सिंह चौहान को यह कहकर हरी झंडी दे दी कि उन्होंने राज्य हित को ध्यान में रखकर बयान दिया था। उसका मतलब कांग्रेस ने राजनीतिक निकालते हुए बवाल मचा दिया है। चौहान की टिप्पणी राज्य हित में बिलकुल सही थी। अब इससे गुरुवार को और राजनीतिक बयानबाजी गरमाने के आसार हैं। साथ ही विधानसभा की कार्रवाई भी फिलहाल शुरू होने के हालात दिखाई नहीं दे रहे हैं।
एक-एक मिनट का हजारों रुपया का हिसाब कौन देगा.....
कांग्रेस और भाजपा के इस कृत्य से विधानसभा के हजारों रुपए के एक-एक मिनट के बेकार जाने से जनता के पैसे की बरबादी होगी। मगर अब इसकी चिंता किसी को क्यों होगी? उन्हें तो रोज के हिसाब से वेतन मिलेगा और जब वे चाहेंगे तब उसे सदन में बढऩे का फैसला करा लेंगे। साथ ही सदन के बाहर उनके काम भी होते रहेंगे। विधानसभा की कार्रवाई मेंं जनसमस्या के निराकरण संबंधी मुद्दों या विकास संबंधी किसी विषय पर सार्थक चर्चा व उसके लिए राशि स्वीकृत करने की उन्हें क्यों चिंता होगी।
मुख्यमंत्री के भूमाफिया के पैसे एकत्रित कर उन्हें हटाने की साजिश रचने के शिवपुरी में दिए गए बयान से आए भूचाल का असर विधानसभा में दिखाई देने लगा है। इस कारण दो दिन से मप्र विधानसभा चल नहीं पा रही। कांग्रेस लगातार इस बयान पर बहस के लिए अड़ी है तो सत्तारूढ़ दल के विधायक इस पर राजी नहीं है। उलटा उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी पर कांग्रेस की टिप्पणी को लेकर वे विपक्ष को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच दिल्ली में भाजपा के राजीव प्रताप रूढ़ी ने शिवराज सिंह चौहान को यह कहकर हरी झंडी दे दी कि उन्होंने राज्य हित को ध्यान में रखकर बयान दिया था। उसका मतलब कांग्रेस ने राजनीतिक निकालते हुए बवाल मचा दिया है। चौहान की टिप्पणी राज्य हित में बिलकुल सही थी। अब इससे गुरुवार को और राजनीतिक बयानबाजी गरमाने के आसार हैं। साथ ही विधानसभा की कार्रवाई भी फिलहाल शुरू होने के हालात दिखाई नहीं दे रहे हैं।
एक-एक मिनट का हजारों रुपया का हिसाब कौन देगा.....
कांग्रेस और भाजपा के इस कृत्य से विधानसभा के हजारों रुपए के एक-एक मिनट के बेकार जाने से जनता के पैसे की बरबादी होगी। मगर अब इसकी चिंता किसी को क्यों होगी? उन्हें तो रोज के हिसाब से वेतन मिलेगा और जब वे चाहेंगे तब उसे सदन में बढऩे का फैसला करा लेंगे। साथ ही सदन के बाहर उनके काम भी होते रहेंगे। विधानसभा की कार्रवाई मेंं जनसमस्या के निराकरण संबंधी मुद्दों या विकास संबंधी किसी विषय पर सार्थक चर्चा व उसके लिए राशि स्वीकृत करने की उन्हें क्यों चिंता होगी।
मंगलवार, 20 जुलाई 2010
बयानों की होड़ में दफन होती राजनीति...
पहले कभी शब्दों को बहुत तोल मोलकर इस्तेमाल किया जाता था। लोगों के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचे और अपना विरोध भी दर्ज हो जाए। मगर अब शायद नेताओं के पास शब्दों का भंडार तो है लेकिन वे उनके इस्तेमाल के पहले सोचते नहीं है। वे जो भी मुंह में आता है बिना सोचे समझे बोलते जाते हैं। यही वजह है कि भाजपा अध्यक्ष नितिन गड़करी हो या पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह या मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान या पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह के बीच बयानों की लड़ाई लगातार जारी है।
गडकरी ने पहले कांग्रेस के लिए कहा अफजल गुरू कांग्रेस का दामाद है फिर दिग्विजयसिंह को औरंगजेब की औलाद कहा था। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान ने भी अपने अध्यक्ष के वक्तव्य को आगे बढ़ाया और दिग्विजयसिंह को औरंगजेब की औलाद कह दिया। इस बीच दिग्विजयसिंह ने गडकरी के लिए कह दिया कि उनमें दिमाग नहीं है। उनके भाई ने भाजपा में रहते हुए गडकरी के बयान का विरोध किया और भाई के समर्थन में खड़े हो गए। इस बयानबाजी में एकबार फिर साफ हो गया कि नेताओं को विरोध के लिए केवल मुंह हिलाना आता है और वे यह नहीं देखते कि उनके एक बयान का क्या असर होगा।
गडकरी ने पहले कांग्रेस के लिए कहा अफजल गुरू कांग्रेस का दामाद है फिर दिग्विजयसिंह को औरंगजेब की औलाद कहा था। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान ने भी अपने अध्यक्ष के वक्तव्य को आगे बढ़ाया और दिग्विजयसिंह को औरंगजेब की औलाद कह दिया। इस बीच दिग्विजयसिंह ने गडकरी के लिए कह दिया कि उनमें दिमाग नहीं है। उनके भाई ने भाजपा में रहते हुए गडकरी के बयान का विरोध किया और भाई के समर्थन में खड़े हो गए। इस बयानबाजी में एकबार फिर साफ हो गया कि नेताओं को विरोध के लिए केवल मुंह हिलाना आता है और वे यह नहीं देखते कि उनके एक बयान का क्या असर होगा।
सोमवार, 19 जुलाई 2010
असहाय या सहानुभूति की नौटंकी....
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जितना कमजोर सीएम देश का शायद ही कोई दूसरा होगा। चार-छह महीने में वे अपने आपको असहाय बताने से नहीं चूकते। जब भी कोई राजनीतिक उठापटक या बयानबाजी होती है तब उनके इसी तरह बयान आ जाते हैं जिससे उनकी लाचारी दिखाई देने लगती है।
शिवपुरी में मुख्यमंत्री चौहान ने कुछ इसी तरह के बयान देकर फिर राजनीतिक सहानुभूति अर्जित करने की कोशिश की है। उन्होंने अपने आपकों को पाक साफ बताते हुए भू-माफिया के खिलाफ कार्रवाई में निष्पक्षता बरतने की बात कही। अपने दामन को साफ बताने के लिए वे यह तक कह गए कि भू-माफिया के खिलाफ जो कार्रवाई की उसमें अपनी पार्टी या दूसरे दल के नेता जैसे भेदभाव को नहीं देखा।
वे सहानुभूति पाने के लिए यह भी कह गए कि उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है क्योंकि कतिपय लोग उन्हें हटाने के लिए रुपए एकत्रित कर रहे हैं। उनके इस बयान के पीछे क्या राजनीति है, यह अभी सामने नहीं आया है लेकिन इतना जरूर इससे शायद हाईकमान उनके बयान से प्रभावित हो जाएगा। जिन लोगों की ओर उन्होंने इशारा किया है वे स्वयं निष्क्रिय हो जाएंगे या हाईकमान उन्हें चुप रहने के संकेत देगा। देखना यह है कि इस बयान का आने वाले दिनों में मप्र की राजनीति में क्या असर पड़ता है।
शिवपुरी में मुख्यमंत्री चौहान ने कुछ इसी तरह के बयान देकर फिर राजनीतिक सहानुभूति अर्जित करने की कोशिश की है। उन्होंने अपने आपकों को पाक साफ बताते हुए भू-माफिया के खिलाफ कार्रवाई में निष्पक्षता बरतने की बात कही। अपने दामन को साफ बताने के लिए वे यह तक कह गए कि भू-माफिया के खिलाफ जो कार्रवाई की उसमें अपनी पार्टी या दूसरे दल के नेता जैसे भेदभाव को नहीं देखा।
वे सहानुभूति पाने के लिए यह भी कह गए कि उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है क्योंकि कतिपय लोग उन्हें हटाने के लिए रुपए एकत्रित कर रहे हैं। उनके इस बयान के पीछे क्या राजनीति है, यह अभी सामने नहीं आया है लेकिन इतना जरूर इससे शायद हाईकमान उनके बयान से प्रभावित हो जाएगा। जिन लोगों की ओर उन्होंने इशारा किया है वे स्वयं निष्क्रिय हो जाएंगे या हाईकमान उन्हें चुप रहने के संकेत देगा। देखना यह है कि इस बयान का आने वाले दिनों में मप्र की राजनीति में क्या असर पड़ता है।
रविवार, 18 जुलाई 2010
खून का रिश्ता ही ऐसा है....

खून के रिश्ते के लिए आमजन तो मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं लेकिन राजनीति में यदाकदा ही उदाहरण सामने आते हैं। इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह के समर्थन में भाजपा नेता लक्ष्मण सिंह की खुल्लम खुल्ला बयानबाजी ने खून के रिश्ते का महत्व फिर जता दिया है। लक्ष्मण सिंह ने कुछ साल पहले कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा को ज्वाइन किया था और सांसद भी बने थे लेकिन उन्होंने कभी भी अपने भाई के खिलाफ कोई बयानबाजी नहीं की।
भाई के रिश्ते को हमेशा सम्मानजनक स्थान देते रहे। जबकि उनके बारे में यह कहा जाता रहा है कि वे जो मुंह में आता है बोल देते हैं। कांग्रेस से भाजपा में जाने के बाद भी उनकी जुबान भाई के विरुद्ध गलत बयानी में नहीं खुली जिससे उनके विरोधियों को करारा तमाचा लगा। अब भाजपा अध्यक्ष गड़करी के दिग्विजयसिंह के खिलाफ स्तरहीन (जैसे बयानबाजी आजकल आमतौर से सभी नेता करने लगे हैं) किए जाने पर उनके विरुद्ध ही बयानबाजी कर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि खून का रिश्ता उनके लिए सबसे ऊपर है। इसका खामियाजा उन्हें पार्टी से निष्कासन के रूप मेें भोगना पड़ा है। मगर इसके बाद भी वे भाई के खिलाफ पार्टी नेताओं द्वारा की जा रही बयानबाजी के विरुद्ध बोलना बंद नहीं किया है। शनिवार को उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चुनौती देकर अपने भाई का बचाव किया। अब देखना यह है कि कहीं उनकी यह रणनीति कहीं भाजपा से निकलकर कांग्रेस में वापसी के लिए तो नहीं है। वैसे कुछ भी गडकरी के एक बयान से दोनों भाई नजदीक जरूर आए हैं।
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
कलम नहीं बंदूक की चाह...
असरदार लोगों से लोग कितने त्रस्त हो चुके हैं, इसका ताजा उदाहरण ग्वालियर के बेलागांव में देखने को मिलता है। भाई भीकम की हत्या के बाद उसका भाई परमाल और उसकी नवविवाहिता अपनी, अपने परिवार और गांव की सुरक्षा के लिए सरकारी बंदूक की चाह रख रहे हैं। सरकार से नौकरी मिलने का आश्वासन पाने वाले परमाल की इसके पीछे यह मंशा है कि वे सरकारी बंदूक वाली नौकरी से सुरक्षित महसूस करेंगे।
परमाल को गुरुवार को शासन-प्रशासन और पीडि़त पक्ष की समझौता वार्ता में सरकारी नौकरी के तौर पर संविदा शिक्षक बनाने का आश्वासन मंत्री नारायण सिंह कुशवाह व कलेक्टर ने दिया था। मगर उसका और उसकी पत्नी का मानना है कि कलम की नौकरी से वे न तो खुद की सुरक्षा कर पाएंगे और न परिवार व समाज की। सभी की सुरक्षा करने के लिए उन्हें बंदूक वाली नौकरी चाहिए। इसलिए उसने शासन और प्रशासन के सामने पुलिस में सिपाही बनाने की मांग रख दी है।
इस घटनाक्रम से शासन और प्रशासन को सबक लेना चाहिए कि भाई की हत्या के बाद इतना बवाल मचने और मंत्री का इस्तीफा होने तथा समाज के उसके समर्थन में खड़ा होने के बाद भी परमाल, उसका परिवार और गांव अभी-भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। इससे लगता है कि वे आज भी कितने खौफजदा हैं। इसलिए उनमें सुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए शासन और प्रशासन को कुछ ऐसा प्रयास करना होगा जिससे गरीब असहाय में सुरक्षा का भाव पैदा हो और असरदार लोगों में एक संदेश जाए कि उनके किसी भी गलत काम को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
परमाल को गुरुवार को शासन-प्रशासन और पीडि़त पक्ष की समझौता वार्ता में सरकारी नौकरी के तौर पर संविदा शिक्षक बनाने का आश्वासन मंत्री नारायण सिंह कुशवाह व कलेक्टर ने दिया था। मगर उसका और उसकी पत्नी का मानना है कि कलम की नौकरी से वे न तो खुद की सुरक्षा कर पाएंगे और न परिवार व समाज की। सभी की सुरक्षा करने के लिए उन्हें बंदूक वाली नौकरी चाहिए। इसलिए उसने शासन और प्रशासन के सामने पुलिस में सिपाही बनाने की मांग रख दी है।
इस घटनाक्रम से शासन और प्रशासन को सबक लेना चाहिए कि भाई की हत्या के बाद इतना बवाल मचने और मंत्री का इस्तीफा होने तथा समाज के उसके समर्थन में खड़ा होने के बाद भी परमाल, उसका परिवार और गांव अभी-भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। इससे लगता है कि वे आज भी कितने खौफजदा हैं। इसलिए उनमें सुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए शासन और प्रशासन को कुछ ऐसा प्रयास करना होगा जिससे गरीब असहाय में सुरक्षा का भाव पैदा हो और असरदार लोगों में एक संदेश जाए कि उनके किसी भी गलत काम को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
आखिर ऐसा क्या मजबूरी थी...
ग्वालियर के बहुचर्चित बेलागांव गोली कांड में प्रशासन ने गुरुवार की शाम जिस तरह से पीडि़त पक्ष के साथ बैठकर समझौता वार्ता की उससे ऐसा लगता है कि कोई न कोई मजबूरी थी जिसके चलते एक पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा व उसके परिजनों की खातिर नाटकीय ढंग से मामले का पटाक्षेप करने की कोशिश की गई। जबकि इससे न तो शहर में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही थी न ही प्रशासन पर कोई दबाव था।
भाजपा की राज्य सरकार में मंत्री रहे अनूप मिश्रा और उनके परिजनों के बेलागांव के भीकम कुशवाह की हत्या और आधा दर्जन लोगों पर जानलेवा हमले में फंस जाने से सरकार पसोपेस में है। अनूप मिश्रा पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी के भांजे हैं तो सरकार की चिंता वैसे ही ज्यादा बढ़ गई है। सरकार पर दाग नहीं लगे इसलिए कूटनीतिक तरीके से अनूप मिश्रा का घटना के कुछ दिन बाद इस्तीफा ले लिया गया। मगर पूर्व प्रधानमंत्री के भांजे का मामला होने से परेशान सरकार की चिंता बढ़ गईं क्योंकि उन्हें बेदाग निकालने के लिए प्रयास होना चाहिए।
इसके लिए सरकार स्तर पर विचार मंथन हुआ और ग्वालियर शहर के एक अन्य मंत्री नारायण सिंह कुशवाह को जिम्मेदारी दी गई। मामले में प्रशासन को भी शामिल किया गया। पीडि़त पक्ष को किस तरह से अपने पक्ष में किया जाए, इसके लिए कवायद शुरु हुई। प्रशासन ने बेलागांव में कुछ दिनों से डेरा डालकर पीडि़त पक्ष के मन की बात जानी। मृतक भीकम के भाइयों से लगातार चर्चा की।
प्रशासन ने इस मामले में फंसे लोगों के खिलाफ पीडि़त पक्ष को शांत करने के लिए राहत राशि और सरकारी नौकरी का टुकड़ा फेंका जो बिलकुल सही निशाने पर लगा। अब क्या था यह देखते ही भीकम की मौत पर राजनीति कर रहे नेताओं में फूट डाली गई। कुछ नेताओं को साथ में लेकर प्रशासन की ओर से कलेक्टर आकाश त्रिपाठी, एसपी ए साईं मनोहर ने मध्यस्थता करते हुए गुरुवार को चाल चली। कुछ घंटे की बैठक के बाद पीडि़त पक्ष सहित बैठक में बुलाए गए उनकी लड़ाई लड़ रहे कुछ नेताओं ने अपनी सहमति दे दी और बात बनते ही समझौते का ऐलान हो गया।
बेलागांव जैसे मामले में प्रशासन की भूमिका एक लाचार की तरह रही। हालांकि सरकार के हर आदेश का पालन करना प्रशासन का मूल उद्देशय है मगर ऐसे न जाने कितने मामले होते हैं जिनमें बेकसूर लोग की मौत हो जाती है और मौत के बाद भी बड़े समूह की समस्या के निराकरण के लिए इस तरह की कोशिशें नहीं होती हैं। सच है इस तरह के प्रयास ऐसे हाईप्रोफाइल नेता और परिवार के लिए किए जाते हैं और जाते रहेंगे। आम आदमी के बारे में सोचने वाला कोई नहीं है। उन्हें तो केवल इस्तेमाल किया जाता रहेगा।
भाजपा की राज्य सरकार में मंत्री रहे अनूप मिश्रा और उनके परिजनों के बेलागांव के भीकम कुशवाह की हत्या और आधा दर्जन लोगों पर जानलेवा हमले में फंस जाने से सरकार पसोपेस में है। अनूप मिश्रा पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी के भांजे हैं तो सरकार की चिंता वैसे ही ज्यादा बढ़ गई है। सरकार पर दाग नहीं लगे इसलिए कूटनीतिक तरीके से अनूप मिश्रा का घटना के कुछ दिन बाद इस्तीफा ले लिया गया। मगर पूर्व प्रधानमंत्री के भांजे का मामला होने से परेशान सरकार की चिंता बढ़ गईं क्योंकि उन्हें बेदाग निकालने के लिए प्रयास होना चाहिए।
इसके लिए सरकार स्तर पर विचार मंथन हुआ और ग्वालियर शहर के एक अन्य मंत्री नारायण सिंह कुशवाह को जिम्मेदारी दी गई। मामले में प्रशासन को भी शामिल किया गया। पीडि़त पक्ष को किस तरह से अपने पक्ष में किया जाए, इसके लिए कवायद शुरु हुई। प्रशासन ने बेलागांव में कुछ दिनों से डेरा डालकर पीडि़त पक्ष के मन की बात जानी। मृतक भीकम के भाइयों से लगातार चर्चा की।
प्रशासन ने इस मामले में फंसे लोगों के खिलाफ पीडि़त पक्ष को शांत करने के लिए राहत राशि और सरकारी नौकरी का टुकड़ा फेंका जो बिलकुल सही निशाने पर लगा। अब क्या था यह देखते ही भीकम की मौत पर राजनीति कर रहे नेताओं में फूट डाली गई। कुछ नेताओं को साथ में लेकर प्रशासन की ओर से कलेक्टर आकाश त्रिपाठी, एसपी ए साईं मनोहर ने मध्यस्थता करते हुए गुरुवार को चाल चली। कुछ घंटे की बैठक के बाद पीडि़त पक्ष सहित बैठक में बुलाए गए उनकी लड़ाई लड़ रहे कुछ नेताओं ने अपनी सहमति दे दी और बात बनते ही समझौते का ऐलान हो गया।
बेलागांव जैसे मामले में प्रशासन की भूमिका एक लाचार की तरह रही। हालांकि सरकार के हर आदेश का पालन करना प्रशासन का मूल उद्देशय है मगर ऐसे न जाने कितने मामले होते हैं जिनमें बेकसूर लोग की मौत हो जाती है और मौत के बाद भी बड़े समूह की समस्या के निराकरण के लिए इस तरह की कोशिशें नहीं होती हैं। सच है इस तरह के प्रयास ऐसे हाईप्रोफाइल नेता और परिवार के लिए किए जाते हैं और जाते रहेंगे। आम आदमी के बारे में सोचने वाला कोई नहीं है। उन्हें तो केवल इस्तेमाल किया जाता रहेगा।
गुरुवार, 15 जुलाई 2010
यह कैसा रिश्ता...

यह प्यार है या मानसिक विक्षिप्तता। किन्नर और पुरुष के बीच संबंध होना, प्रकृति के विरुद्ध है। ये रिश्ते ज्यादा समय तक नहीं चलते। मगर फिर लोग मानसिक विकृति की वजह से ऐसे कदम उठाते हैं और कुछ समय बाद वे प्रकृति से दो चार होते हैं तो फिर परेशान होते हैं।
खंडवा और इटारसी के ऐसे ही किन्नर और एक युवक की कहानी इन दिनों चर्चा में है। दोनों टे्रन में वसूली और धंधा कर अपना गुजर-बसर करते हैं। दोनों की मुलाकात वहां हुई और वे युवक को किन्नर ने अपने जाल में ऐसा फंसाया कि युवक उससे शादी तक को तैयार हो गया। गुरुवार को उसकी जिद्द के आगे माता-पिता की एक न चली और बाकायदा सात फेरे लेकर युवक ने किन्नर को दुल्हन के जोड़े के रूप में शादी रचा ली।
इस जोड़े की कहानी पता नहीं कितनी चले मगर ग्वालियर के ऐसे ही एक जोड़े की कहानी भी लोग इन दिनों याद कर रहे हैं। एक किन्नर के साथ युवक ने शादी तो कर ली मगर कुछ समय बाद दोनों के बीच ऐसे कटुता आई कि वे अलग हो गए। दोनों के बीच रोजाना झगड़े होते थे। किन्नर युवक पर अक्सर हावी रहता था तो परेशान होकर वह घर छोड़कर भाग गया। ऐसे ही कुछ और उदाहरण बताए जाते हैं जिनसे प्रकृति के खिलाफ जाकर विवाह रचने वाले लोगों की तनावग्रस्त लाइफ का पता चलता है। प्रकृति के विपरीत चलना बहुत कष्टप्रद होता है और ऐसे कदम बाद में पछतावे के अलावा कुछ नहीं देते।
बुधवार, 14 जुलाई 2010
उमा भारती से खौफजदा नेता...

भाजपा में कई नेता इन दिनों भयभीत हैं। इन सब के डर का कारण केवल एक है वह उमा भारती की पार्टी में वापसी के समाचार। भाजपा और आरएसएस के कई दिग्गज उनकी वापसी को लेकर कई बार स्तर पर विचार विमर्श कर चुके हैं जिसके चलते साध्वी उमा भारती की वापसी का रास्ता काफी आसान हो गया है। साध्वी के आक्रामक मिजाज से उनके पुराने साथी भयाक्रांत हैं क्योंकि जब वे पार्टी से निकाली गईं थीं तब उनके बयानों में उमा भारती को निकलने के फैसले का न केवल समर्थन बल्कि उनके व्यवहार व उनके रवैये पर भी कई उल्टी-सीधी टिप्पणी की गईं थीं।भाजपा में सबसे ज्यादा दहशत में हैं तो पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर, संस्कृति मंत्री लक्ष्मीनारायण शर्मा जैसे कमजोर नेता। गौर वे हैं जिन्होंने कुर्सी की खातिर मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने के बाद भी एक केबिनेट मंत्री की कुर्सी को संभालने में संकोच नहीं किया। साथ ही जिन्होंने उम्र दराज होने के बाद भी विधानसभा के टिकट के लिए दिल्ली तक की दौड़ लगाई। यही नहीं बहु के लिए भी जिद कर टिकट लिया। लक्ष्मीकांत शर्मा हालांकि इस तरह के नहीं हैं लेकिन उन्होंने भी उमा भारती को पार्टी से निकाले जाने के बाद तीखे बयान दिए थे। इसी तरह आलोक शर्मा, विश्वास सारंग, शैलेंद्र शर्मा और कुछ अन्य नेताओं के बर्ताव में भी उमा भारती के पार्टी से निकालने जाने के बाद अचानक बदलाव आया था। रघुनंदन शर्मा, प्रहलाद पटेल, शैतानसिंह साथ तो गए थे मगर वे भी उन्हें मझधार में छोड़कर पार्टी में लौट आए थे। इनके अलावा पार्टी में कुछ ऐसे भी नेता हैं जो उमा भारती के पार्टी से जाने के बाद भी संपर्क में रहते थे। मगर इन दिनों उनके सितारे गर्दिश में हैं। उमा भारती की वापसी उनके लिए अच्छे दिन लाएगी, इस उम्मीद से वे अभी चुप्पी साधे हैं।
शनिवार, 10 जुलाई 2010
कहां जाएं लड़कियां....

समाज में नित नए बदलाव आ रहे हैं जिनके चलते लड़कियां भी उसी तरह अपने आपको बदल रही हैं। उनके पहनावे, रहन-सहन पर भी इसका असर दिखाई दिया है। जो लड़की पहले चूल्हा चौके के अलावा स्कूल के बारे में सोच भी नहीं सकती थी वह आज इंजीनियर-डॉक्टर और विमान उड़ा रही है। सड़कों पर जींस, बिना दुपट्टे के नए डिजाइन के सलवार-शूट पहनने लगी है। तथाकथित पुरुष प्रधान समाज इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। लड़कियों को वह पर्दे के भीतर ही देखना चाहता है।इसका एक दूसरा पहलु यह भी है कि लड़कियों के बदलाव को लेकर कुछ लोग सकारात्मक भी लेते हैं और वे इसे समाज के विकास का प्रतीक बताते हैं। यह सही भी है। मगर कुछ ऐसे तत्व समाज के इस बदलाव को दुषित मानसिकता से देखते हैं। लड़कियों को स्कूल-कॉलेज या कोचिंग में पढऩे के समय में बॉलीवुड के हीरो बनकर छेड़छाड़ करते हैं। लड़कियों पर कमेंट पास करते हैं। इससे लड़किया डरी सहमी से सड़क पर निकलने को मजबूर हो जाती हैं। पुलिस भी ऐसे मनचलों के खिलाफ रोजाना अभियान चला सकती है।
क्या करें लड़कियां:- छेड़छाड़ से बचने के लिए सबसे पहले सहेलियों या समूह के साथ ही सड़क पर चलने की कोशिश करें। - जब अकेले जाएं तो ऐसे मनचलों की ओर ध्यान नहीं दें। अगर ज्यादा गंभीर बात हो तो किसी भी पुलिस थाने या चौकी या चौराहे पर खड़े पुलिस के जिम्मेदार कर्मचारी को बताएं।- मोबाइल नंबर किसी को भी नहीं दें। सहेलियों को भी मोबाइल नंबर नहीं दें। - स्कूल या कॉलेज में जिस वाहन से आते-जाते हैं उनके नंबर तथा चालक का मोबाइल नंबर नोट करें।- स्कूल या कॉलेज बस से पीछा किए जाने के संदेह में परिजनों को बताएं जिससे वे इसके लिए उपाय करें।- किसी भी सहेली के कहीं बुलाने पर न जाएं। अनजान स्थान पर तो जाने के बारे में बात ही नहीं करें। - परिवार वालों से हर छोटी बात शेयर करें जिससे आपकी नजर में जो गंभीर नहीं हो वे उसकी गंभीरता को समझकर उसके बारे में सोच सकते हैं। - परिवार वालों से कुछ भी नहीं छिपाएं जिससे कोई अगर ब्लैकमेल करने का प्रयास कर रहा हो तो उस पर वे एक्शन ले सकें।
क्या करें लड़कियां:- छेड़छाड़ से बचने के लिए सबसे पहले सहेलियों या समूह के साथ ही सड़क पर चलने की कोशिश करें। - जब अकेले जाएं तो ऐसे मनचलों की ओर ध्यान नहीं दें। अगर ज्यादा गंभीर बात हो तो किसी भी पुलिस थाने या चौकी या चौराहे पर खड़े पुलिस के जिम्मेदार कर्मचारी को बताएं।- मोबाइल नंबर किसी को भी नहीं दें। सहेलियों को भी मोबाइल नंबर नहीं दें। - स्कूल या कॉलेज में जिस वाहन से आते-जाते हैं उनके नंबर तथा चालक का मोबाइल नंबर नोट करें।- स्कूल या कॉलेज बस से पीछा किए जाने के संदेह में परिजनों को बताएं जिससे वे इसके लिए उपाय करें।- किसी भी सहेली के कहीं बुलाने पर न जाएं। अनजान स्थान पर तो जाने के बारे में बात ही नहीं करें। - परिवार वालों से हर छोटी बात शेयर करें जिससे आपकी नजर में जो गंभीर नहीं हो वे उसकी गंभीरता को समझकर उसके बारे में सोच सकते हैं। - परिवार वालों से कुछ भी नहीं छिपाएं जिससे कोई अगर ब्लैकमेल करने का प्रयास कर रहा हो तो उस पर वे एक्शन ले सकें।
शुक्रवार, 9 जुलाई 2010
हजारों करोड़ों के नुकसान की बिना पर बंद क्यों...

अब जनता समझ गई है कि बंद आखिर क्यों होते हैं? उसने सवाल उठाना शुरू कर दिए हैं कि जब महंगाई का राजनीतिक विपक्षी पार्टियां विरोध करती हैं तो वे देश को और नुकसान क्यों पहुंचाती हैं। बंद से करीब 13000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यह राशि किसी छोटे राज्य के बजट के बराबर है जिससे उसकी सालभर की अर्थव्यवस्था का संतुलन बना रहता है। तेरह हजार करोड़ रुपए के नुकसान से क्या देश में महंगाई पर असर नहीं पड़ेगा। इस कारण कुछ महीनों बाद फिर कुछ प्रतिशत महंगाई बढ़ेगी और पुन: विपक्षी दल उसका विरोध करेंगे। फिर से हजारों करोड़ों रुपयों का नुकसान होगा। आखिर ऐसे बंद से जब देश को लगातार नुकसान हो रहा है तो महंगाई के विरोध का दूसरा गांधीगिरी का तरीका क्यों नहीं जनता को सुझाया जाता। यानी सरकारी कर्मचारी एक घंटे ज्यादा काम करें। नेता मंत्रियों और नीति निर्णायकों के बंगलों के सामने मुंह पर पट्टी बांधकर भूखे-प्यासे बैठे। व्यपारी विरोध के दिन गांधीगिरी के दूसरे तरीकों पर सोच-विचार कर अमल करे। महंगाई के विरोध के लिए देशभर के उद्योग धंधों, व्यापार, परिवहन साधनों को बंद कराना कहां का तरीका है। जब पता है कि इस विरोध से महंगाई और बढ़ेगी। आखिर इस विषय में नेताओं, असरदार लोगों, बुद्धिजीवियों को सोचना होगा। अन्यथा महंगाई के ऐसे विरोध से हम भी अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई को बढ़ाने में इसी तरह योगदान देते रहेंगे।
गुरुवार, 8 जुलाई 2010
आरएसएस आदर्श है तो फिर आनुशांगिक संगठन अलग कैसे...


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस की विचारधारा आज भी लगभग वैसी है। इसमें समय के साथ उससे नई उम्र के लोगों के जुडऩे, समाज में आए बदलाव का कुछ हद तक प्रभाव पड़ा है। मगर फिर भी आज आरएसएस से सीधे जुड़े लोगों में अनुशासन और नैतिकता काफी मिलती है। वहीं दूसरी तरफ इसके अनुशांगिक संगठनों के मामले में बिलकुल इतर स्थिति है। उन पर समाज में आए बदलाव, नई उम्र के लोगों के जुडऩे और दूसरी विचारधारा के लोगों के उनसे जुडऩे का बहुत ज्यादा असर पड़ा है। सबसे ज्यादा असर भाजपा पर पड़ा है जिसमें नैतिकता और अनुशासन तो बचा ही नहीं है। आरएसएस के अनुशांगिक संगठनों में सबसे ज्यादा खराब हालत बजरंग दल की है। इसमें अनुशासन नाम की चीज शायद नहीं है। नेतृत्व की भी इसमें कोई नहीं सुनता। हर कहीं असामाजिक तत्वों जैसी हरकतें कर ये अपनी ही पार्टी की सरकारों के लिए कई बार मुसीबत खड़ी करते रहे हैं। इनकी छवि भी मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन सिमी जैसी बनने लगी थी जब इससे जुड़े कुछ नेताओं का नाम बम विस्फोटों में शामिल हुआ। हालांकि इसके बाद अब बजरंग दल का नाम ऐसे मामलों से दूर है। फिर बजरंग के नाम से व्यापारी, पुलिस और समाज का सभ्य वर्ग कुछ भय खाता है जो किसी भी संगठन के लिए अच्छी बात नहीं है। राजनीति में भाजपा भी आरएसएस विचारधारा के अनुरूप अपनी छवि को धीरे-धीरे खोती जा रही है। इसमें दूसरे दलों के खराब छवि वाले लोगों के लगातार प्रवेश करने से पार्टी की इमेज पर विपरीत असर पड़ा है। बाहुबलियों और अपराध के आरोपों से घिरे नेताओं के पार्टी में आने से भाजपा दूसरों से अलग दल की छवि को तोड़ती जा रही है। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अपने नेताओं को प्रश्रय दिए जाने के कई उदाहरण सामने आने के बाद भी पार्टी के सरकारें उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही हैं जिससे उनकी छवि आरएसएस के विपरीत बन रही है। अनुशासनहीनता की बात करें तो कोई भी मंत्री अपने ऊपर लगे आरोपों की सफाई के स्थान ढीटों की तरह इस्तीफा नहीं देने की बात करते हैं। और तो अपने वरिष्ठ नेताओं के नाम लेकर कहते हैं कि उन पर भी आरोप हैं वे क्यों पद से इस्तीफा नहीं देते। आज देश में राजनीतिक दलों की स्थिति यह है कि सभी एकधारा में बह रहे हैं। भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार बन गया है। अपनों से बड़ों का सम्मान नहीं करना, अनुशासन की रेखा के भीतर आ गया है। यह सब चापलुसी, अपनी रेखा बड़ी करने के स्थान पर दूसरी की काटने की प्रवृत्ति वाले लोगों को बढ़ावा मिलने से हुआ है। ऐसे लोगों से भाजपा जैसे दलों को बचना होगा क्योंकि वह दूसरे राजनीतिक दलों से स्वयं को अलग होने का दावा करते हैं।
मंगलवार, 6 जुलाई 2010
फर्राटा क्रिकेट के बादशाह माने जाने वाले भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने जिस तरह गुपचुप ढंग से शादी की वह वाकई तारीफे काबिल है। अगर वे सगाई के कुछ बाद शादी का फैसला लेते तो शायद साक्षी शादी के मंडप में नहीं होती। वजह सभी जानते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के पास समय की अधिकता और खबरों की कमी। जब उनके पास मसाला नहीं होता तो वे धोनी के पिछले सभी उन प्रसंगों को उठाना शुरू कर देते जो विज्ञापनों के दौरान या खेल खेल में घटनावश हुईं। इन घटनाओं को तमाम कल्पनाओं के आधार पर पेश किया जाता। तस्वीरों के साथ पेश किया जाता जो शूटिंग के दौरान खींची गईं होती। ऐसे में साक्षी का मन बदल सकता था।
इच्छा शक्ति से संभव है विकास
शहर को भोपाल या जयपुर की तर्ज पर सौंदर्यीकरण करने की योजना सुनने और उस पर अमल होने के बाद देखने में तो बहुत अच्छी लगती है लेकिन पहले शहर में पानी, बिजली, अतिक्रमण और यातायात के बढ़ते दबाव से जूझ रहे लोगों की परेशानियों को हल करने के लिए भी नेताओं और अफसरों को सोचना चाहिए। भोपाल और जयपुर में नेताओं और नौकरशाहों की दृढ़ इच्छाशक्ति से आज इन समस्याओं को काफी हद तक काबू में रखा गया है।
भोपाल के नए शहर में तीनों लिंक रोड सहित वीआईपी रोड, वन विहार रोड, जेल रोड, वल्लभ भवन रोड, ठंडी सड़क जैसी लंबी सड़कें नगर की शान मानी जाती हैं। वहीं जयपुर की एमआई रोड, भवानी सिंह रोड का जवाब नही लेकिन वहां की विरासत हवामहल, जल महल और सुव्यवस्थित तरीके का चांद पोल बाजार नगर के लिए गौरव है। इनकी तुलना में ग्वालियर की सड़कों को देखें तो दोनों नगरों की तुलना में कोई भी नहीं है। इसी तरह मान महल, गूजरी महल, जयविलास पैलेस, महाराज बाड़ा मौजूद हैं जिनको देखने के बाद लगता नहीं कि किसी ने कभी इनकी चिंता की है। अब सांसद यशोधरा राजे सिंधिया और अफसर इनकी चिंता कर रही हैं, यह अच्छी पहल है।
ग्वालियर शहर की समस्या कुछ हद तक भोपाल-जयपुर से मिलती जुलती है। जैसे भोपाल में सीहोर, विदिशा, होशंगाबाद, रायसेन और दूसरे प्रदेशों तथा जयपुर में सवाईमाधौपुर, टोंक, दौसा, करौली जैसे जिलों से लोग रोजगार की तलाश में आए व बस गए। ठीक उसी तरह ग्वालियर में भिंड-मुरैना, दतिया, झांसी, आगरा आदि से लोग नौकरी-धंधे के लिए आकर बसते जा रहे हैं। भोपाल और जयपुर में बाहरी जनसंख्या के कारण आज सड़कों पर यातायात का दबाव बढ़ गया है मगर नेताओं और अफसरों ने समय-समय पर दृढ़ इच्छाशक्ति जताते हुए अतिक्रमण को हटाया। आबादी की औसत वृद्धि के हिसाब से भोपाल-जयपुर में पानी की जरूरत का अंदाज लगाकर इंतजाम किए गए मगर बाहरी आबादी के तेजी से आने की वजह से आज दोनों शहर पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। फिर भी वहां इसको लेकर चिंता होने से भविष्य की योजना बनाई जा रही है। भोपाल में 20 साल आगे का सोचकर नर्मदा नदी का जल लाया जा रहा है तो जयपुर में रामगढ़ बांध से पानी नहीं मिल पाने पर बीसलपुर बांध से पानी लिया जा रहा है। ट्यूबवेल से भी पानी के इंतजाम किए जा रहे हैं। सड़कों के चौड़ीकरण के लिए भोपाल में जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत काम किया जा रहा है।
भोपाल और जयपुर की तरह ग्वालियर शहर के विकास का सपना दिखाने वाले नेता और प्रशासन को यह अवश्य सोचना चाहिए कि दोनों राज्य की राजधानियां जिन समस्याओं से जूझ रही हैं उन्हें भी ध्यान में रखे। ग्वालियर की स्थितियां दोनों शहरों से कुछ अलग हैं। भोपाल व जयपुर में बिजली चोरी ग्वालियर की तुलना बहुत कम है। भोपाल-जयपुर में भी कुछ इलाकों में पानी के लिए टैंकर की मदद ली जाती है लेकिन इसके लिए लोगों को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता। दोनों शहर के स्थानीय नेता भी अतिक्रमण के खिलाफ शासन-प्रशासन को सहयोग करते हैं वहीं बिजली चोरी रोकने में भी स्थानीय नागरिक-बिजली कंपनी के अफसर सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। सभी को पानी मिलेगा इस बारे में दूरगामी योजना बनाने के लिए सोचा जाता है। यह जरूरी है कि भोपाल-जयपुर की तरह विकास की योजना बनाते समय ग्वालियर के लोगों को पानी, बिजली, अतिक्रमण, बढ़ते यातायात की समस्या से निजात दिलाने के लिए भी सोचा जाए।
भोपाल के नए शहर में तीनों लिंक रोड सहित वीआईपी रोड, वन विहार रोड, जेल रोड, वल्लभ भवन रोड, ठंडी सड़क जैसी लंबी सड़कें नगर की शान मानी जाती हैं। वहीं जयपुर की एमआई रोड, भवानी सिंह रोड का जवाब नही लेकिन वहां की विरासत हवामहल, जल महल और सुव्यवस्थित तरीके का चांद पोल बाजार नगर के लिए गौरव है। इनकी तुलना में ग्वालियर की सड़कों को देखें तो दोनों नगरों की तुलना में कोई भी नहीं है। इसी तरह मान महल, गूजरी महल, जयविलास पैलेस, महाराज बाड़ा मौजूद हैं जिनको देखने के बाद लगता नहीं कि किसी ने कभी इनकी चिंता की है। अब सांसद यशोधरा राजे सिंधिया और अफसर इनकी चिंता कर रही हैं, यह अच्छी पहल है।
ग्वालियर शहर की समस्या कुछ हद तक भोपाल-जयपुर से मिलती जुलती है। जैसे भोपाल में सीहोर, विदिशा, होशंगाबाद, रायसेन और दूसरे प्रदेशों तथा जयपुर में सवाईमाधौपुर, टोंक, दौसा, करौली जैसे जिलों से लोग रोजगार की तलाश में आए व बस गए। ठीक उसी तरह ग्वालियर में भिंड-मुरैना, दतिया, झांसी, आगरा आदि से लोग नौकरी-धंधे के लिए आकर बसते जा रहे हैं। भोपाल और जयपुर में बाहरी जनसंख्या के कारण आज सड़कों पर यातायात का दबाव बढ़ गया है मगर नेताओं और अफसरों ने समय-समय पर दृढ़ इच्छाशक्ति जताते हुए अतिक्रमण को हटाया। आबादी की औसत वृद्धि के हिसाब से भोपाल-जयपुर में पानी की जरूरत का अंदाज लगाकर इंतजाम किए गए मगर बाहरी आबादी के तेजी से आने की वजह से आज दोनों शहर पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। फिर भी वहां इसको लेकर चिंता होने से भविष्य की योजना बनाई जा रही है। भोपाल में 20 साल आगे का सोचकर नर्मदा नदी का जल लाया जा रहा है तो जयपुर में रामगढ़ बांध से पानी नहीं मिल पाने पर बीसलपुर बांध से पानी लिया जा रहा है। ट्यूबवेल से भी पानी के इंतजाम किए जा रहे हैं। सड़कों के चौड़ीकरण के लिए भोपाल में जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन के तहत काम किया जा रहा है।
भोपाल और जयपुर की तरह ग्वालियर शहर के विकास का सपना दिखाने वाले नेता और प्रशासन को यह अवश्य सोचना चाहिए कि दोनों राज्य की राजधानियां जिन समस्याओं से जूझ रही हैं उन्हें भी ध्यान में रखे। ग्वालियर की स्थितियां दोनों शहरों से कुछ अलग हैं। भोपाल व जयपुर में बिजली चोरी ग्वालियर की तुलना बहुत कम है। भोपाल-जयपुर में भी कुछ इलाकों में पानी के लिए टैंकर की मदद ली जाती है लेकिन इसके लिए लोगों को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता। दोनों शहर के स्थानीय नेता भी अतिक्रमण के खिलाफ शासन-प्रशासन को सहयोग करते हैं वहीं बिजली चोरी रोकने में भी स्थानीय नागरिक-बिजली कंपनी के अफसर सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। सभी को पानी मिलेगा इस बारे में दूरगामी योजना बनाने के लिए सोचा जाता है। यह जरूरी है कि भोपाल-जयपुर की तरह विकास की योजना बनाते समय ग्वालियर के लोगों को पानी, बिजली, अतिक्रमण, बढ़ते यातायात की समस्या से निजात दिलाने के लिए भी सोचा जाए।
रविवार, 4 जुलाई 2010
ढोल-ढमाके के बिना सगाई

क्रिकेट के शहंशाह महेंद्र सिंह धोनी ने गुपचुप क्या शादी की, लाखों लड़कियों का दिल टूट गया। शनिवार रात यह खबर आई। अब रविवार की सुबह देखना है कि इस खबर का देशभर की उन लड़कियों का क्या हाल होगा? वे इस सदमें को कैसे बर्दाश्त कर पाएंगी। गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले कमोबेश यही स्थिति सानिया मिर्जा की शादी के फैसले पर लड़कों की हुई थी। हालांकि उस समय पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से उसके शादी के फैसले की वजह से ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं हुई क्योंकि तब देश के नौजवानों का देशप्रेम अचानक जागा उठा था। मगर रविवार की सुबह भारतीय लड़कियां साक्षी को अपनी सौत मान बैठेंगी भले ही धोनी को पता नहीं है कि वे कौन हैं। साक्षी को गर्व जरूर होगा कि वह लाखों में एक है। देखना यह है कि रविवार की सुबह धोनी की फैन लड़कियां कैसी प्रतिक्रिया देती हैं।
शनिवार, 3 जुलाई 2010
सच के आगे झुकी सरकार
आखिर मप्र सरकार ने अपने एक मंत्री की बलि देकर सच के सामने घुटने टेक दिए। स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्रा के इस्तीफे ने बेला गांव के गरीब परिवारों के दर्द को काफी हद तक राहत दी है लेकिन रसूखदारों के सितम के मारे ये ग्रामीण अभी-भी इसे पूरा न्याय नहीं मान रहे हैं। वे कह रहे हैं कि उन्हें तो तभी संतोष होगा जब सरकार आरोपियों की गिरफ्तारी कराएगी। प्रदेश के दागी मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए रतलाम में कार्यसमिति की बैठक में दबाव बना था। इस दबाव के आगे दागी मंत्रियों में से एक अनूप मिश्रा ने घुटने टेक दिए लेकिन कैलाश विजयवर्गीय, जयंत मलैया, बाबूलाल गौर, विजय शाह जैसे मंत्री टस से मस नहीं हुए। उलटा विजय शाह ने तो ग्वालियर में यह तक कह दिया कि मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। आखिर ऐसे नेताओं से किस नैतिकता की अपेक्षा की जा सकती है। बेला गांव के दर्द के बहाने को हथियार बनाकर अनूप मिश्रा ने इस्तीफा दिया है। कांग्रेस और कुछ अन्य राजनीतिज्ञों को इसमें भी राजनीति की बू आ रही है। देखना यह है कि इस इस्तीफे के बाद प्रशासन और पुलिस बेला गांव हत्याकांड के आरोपियों की धरपकड़ में कितनी तेजी लाती है और उनके खिलाफ सबूत जुटाने में कैसी रणनीति अपनाती है।
शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
गरीब का कोई कैसे नहीं होता....

राजनीति भले ही बुरी चीज हो लेकिन कई बार उसके फैसलों से लगता है कि राजनीति के दांव-पेंच में कई बार गरीब का भी अप्रत्यक्ष रूप से भला हो जाता है। इसका ताजा उदाहरण ग्वालियर के बेला गांव के गरीबों का है। बेला गांव के ग्रामीणों के रास्ते के मुद्दे में प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्रा ने बाहुबल के सहारे गांव को खाली कराने का प्रयास किया लेकिन एक युवक की मौत ने उनका राजनीतिक जीवन बदल दिया। विरोधियों को ऐसा मौका हाथ लगा कि वे अनूप मिश्रा को कमजोर कर सरकार से बाहर करने में सफल हो गए। बेला गांव के भीकम की मौत ने अनूप मिश्रा के परिवार के सदस्यों को घेरे में ले लिया है। करीब दस दिन चले घटनाक्रम में विपक्ष ने कम और उनकी पार्टी के नेताओं ने मामले को ज्यादा तूल दिया। गांव में रोजाना पार्टी के नेताओं की आवाजाही रही और अखबारों में बयान भी की कि आपको न्याय मिलेगा। यह पार्टी नेताओं की कौन सी नीति थी। इसी तरह बंद के आयोजन को प्रशासन ने भी अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग दिया। बंद समर्थकों की धींगा-मस्ती को प्रशासन ने ऐसे नजरअंदाज किया जैसे की सत्ताधारी दल की ओर से बंद का आयोजन किया जा रहा हो। अनूप मिश्रा के बारे में कहा जाता है कि जिला प्रशासन में उनकी तूती बोलती है लेकिन पूरे घटनाक्रम में प्रशासन ने चुप्पी साधने के स्थान पर लीज प्रशासनिक जांच रिपोर्ट तैयार कराने जैसे बयान दिए। कुछ भी हो राजनीति के अखाड़े में एक गरीब भीकम की आत्मा को जरूर शांति मिलेगी कि सरकार ने उसके (कथित) आरोपियों को सजा दिलाने के लिए दबाव बनाया। वैसे हत्या में कोई भी आरोपी हो लेकिन रास्ता बंद करने और गांव के लोगों को जमीन खाली करने के लिए दबाव बनाने में जरूर अनूप मिश्रा की भूमिका रही थी। अब प्रशासन को गांव वालों को न्याय दिलाना है कि उनके सालों पुराने कब्जे मिलें और गैर आबाद गांव में बदलकर ग्रामीणों के साथ ज्यादती करने वालों को सजा दे।
संदेश पर अमल की बारी...


भाजपा भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा बोलती रहती थी लेकिन दो सरकारों का स्वाद चखने के बाद उसके कई नेताओं का दामन भी पाक साफ नहीं बचा है। इनमें से कुछ मंत्री बहुत ज्यादा आरोपों में घिर हैं। समय समय पर उन पर लगे आरोपों पर कार्रवाई के लिए दबाव बनता है लेकिन पार्टी आलाकमान से ये लोग कहीं न कहीं अपने आपको बचा लाते हैं। अब एक बार फिर कार्यसमिति की बैठक में कुछ इसी तरह का दबाव बना है। प्रदेश प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार ने दागी मंत्रियों को हटाए जाने की वकालत की तो राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने इसे पार्टी का संदेश कहकर उक्त नेताओं के होश उड़ा दिए हैं। अब बारी पार्टी के इस संदेश पर अमल की है। संदेश पर अमल के लिए अब शायद सरकार वक्त मांगे और इस वक्त का दागी मंंत्री फिर कोई फायदा ले लें। कहीं अपने बचाव का रास्ता खोजकर पार्टी के अपने आकाओं के हाथ-पैर जोड़कर राष्ट्रीय अध्यक्ष पर दबाव बनाएं। यह तो वक्त बताएगा कि गडकरी के संदेशवाहक अनंत की बात पर किस मंत्री पर गाज गिरती है या सभी बेदाग साबित करने में सफल हो जाते हैं।
गुरुवार, 1 जुलाई 2010
मंत्री के परिवार का आरोप सिर लिया, छोटी बात है क्या!

प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा के बेटे अश्विनी, भाई अजय व अभय और ममेरे भाई दीपक बाजपेयी हत्या के एक मामले में उलझ चुके हैं लेकिन उन्हें उबारने के लिए मंत्री के खास समर्थक कहे जाने वाले भिंड के मेहगांव के प्रभात किशोर उर्फ लला दुबे ने आरोप अपने सिर लेने की कोशिश की है। पुलिस ने उसके जुर्म कबूलने पर गिरफ्तारी भी कर ली है। मंत्री के परिजनों को बचाने का प्रयास कर रहे लला दुबे अब पुलिस के लिए खास मेहमान बन चुका है। पत्रिका ग्वालियर ने इस खास मेहमान की ऐसे तस्वीर प्रकाशित की है जिसमें पुलिस की आवभगत और मेहमान नवाजी उजागर हो रही है। थाने के कंप्यूटर कक्ष में वह कुर्सी पर आराम से बैठा है। बताया जाता है कि तस्वीर उतारने के पहले वह समाचार पत्रों को पढ़कर देश-दुनिया और अपनी खबर ले रहा था कि उसके बारे में कहां क्या छपा है। कैमरा देखते ही वह अलर्ट हो गया। हालांकि कैमरामैन ने उसकी तस्वीर न उतारने का नाटक किया मगर फिर भी वह सावधान रहा। इसके बाद कैमरामैन ने एक तस्वीर तो उतार ही ली। पुलिस थाने में पुलिस रिमांड वाले आरोपी के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है यह किसी से छुपा नहीं है। उसे जब परिजन खाने देने आते हैं तो पहले उसका टिफिन चैक किया जाता है और उसे तो सीखचों में रखा ही जाता है परिजनों को मिलने तक नहीं दिया जाता। तस्वीर साफ बताती है कि लला दुबे को पुलिस थाने में कैसा ट्रीटमेंट मिल रहा है। कंप्यूटर कक्ष में एक गैर पुलिस कर्मचारी भी मौजूद है जो कंप्यूटर पर काम कर रहा है। एक पुलिसकर्मी भी तस्वीर में दिख रहा है लेकिन उसके हाथ में न तो कागज है न कलम, जिससे यह लगे कि लला दुबे से कोई पूछताछ हो रही है। पुलिस के थाने में आए आरोपियों के साथ दो तरह के व्यवहार की यह एक और कहानी है। आखिर लला दुबे को क्यों यह ट्रीटमेंट दिया जा रहा है, इसके लिए जिम्मेदार कौन है, इसकी जांच आला अधिकारियों को करना चाहिए।
बुधवार, 30 जून 2010
शेर की मांद में पहुंचकर किसी की आवाज निकली है...

गैस कांड का फैसला आने के बाद राज्य हो या केंद्र सरकार सभी ने बड़ी-बड़ी बातें कीं। केंद्र सरकार ने मंत्री समूह बनाकर गैस पीडि़तों के मुआवजा आदि को लेकर बहुत बयानबाजी और बैठकें भी हुई ं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो मंत्री समूह को अपनी तरफ से अंतिम तारीख भी दी थी। इसके बाद यहां तक आया कि तीन श्रेणी में गैस पीडि़तों को मुआवजा दिया जाएगा।
मगर यह सब दिखावा ही लगता है क्योंकि पीएम मनमोहन सिंह की अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात करते हुए तस्वीरें छपीं। खबरें भी प्रकाशित हुईं। इनमें कहीं भी पढऩे में नहीं आया कि श्री सिंह ने ओबामा के सामने गैस शब्द तक का जिक्र किया हो। फिर एंडरसन के नाम लेना तो दूर की बात है। हमारे प्रधानमंत्री की आवाज इस मुद्दे पर वहां तो नहीं निकली लेकिन जैसे उनके सामने हटे तो विमान में उड़ते समय फिर बातें (हवाई) कींं कि वारेन एडंरसन के प्रत्यपर्ण के मामले में अमेरिका और अनुकूल रवैया अपनाए। वाह! यह है तीसरी दुनिया का सबसे बड़ी आबादी वाले और दुनिया के लिए सबसे बड़े बाजार भारत के प्रधानमंत्री की दृढ़ताभरी आवाज। ऐसे में गैस पीडि़तों को क्या न्याय मिलेगा यह वे (गैस पीडि़त) खुद तय कर सकते हैं।
सब जानते हैं मगर बोलते नहीं
प्रदेश सरकार के असरदार मंत्री अनूप मिश्रा इन दिनों भारी संकट के दौर से गुजर रहे हैं। वजह है उनके साथ चलने वाली वह भीड़ जो उन्हें सही राय देने बजाय उनकी ताकत का अहसास कराती रहती है। ग्वालियर शहर में हाल ही में हुई दो घटनाओं से उनके राजनीतिक जीवन पर दाग लगने की स्थिति बन गई है। हां यह जरूर है कि अभी भी उनके आसपास की भीड़ उन्हें उनकी ताकत के भ्रम में डालकर हकीकत से दो चार नहीं होने दे रही।ग्वालियर की शान और ऐतिहासिक इमारतों में से एक विक्टोरिया मार्केट की आग में स्वाहा हुई दुकानों के मालिकों के विस्थापन का मामला लें तो मंत्री एक दिन अचानक सिंधिया ट्रस्ट की जमीन गोरखी पर कब्जा दिलाने पहुंच गए। वहां जो हुआ कैमरों में कैद है। मंत्री के नजदीकी रिश्तेदार दीपक बाजपेयी ने सिंधिया ट्रस्ट के वकील अनिल मिश्रा को जिस अंदाज में गोरखी से भगाया वह किसी असामाजिक तत्व से कम नहीं था। इसी तरह उसी दिन मंत्री से जोर से आवाज में बात करने वाले एक टैक्सी चालक शहाबुद्दीन को मिश्रा समर्थकों ने जमकर धुना। दूसरा मामला शिक्षण संस्थान आईपीएस कॉलेज प्रबंधन द्वारा बेला गांव के करीब 35 परिवारों का रास्ता बंद उन्हें गांव खाली कराने का धमकाने का है। इस कॉलेज के बारे में कहा जाता है कि मंत्री मिश्रा का है। जब बेला गांव के लोगों ने विरोध किया तो मंत्री के रिश्तेदारों और कई गुंडों ने मिलकर गांव पर बंदूकों से हमला किया। इसमें एक युवक मारा गया। यह मामला इतना तूल पकड़ चुका है कि अब राजधानी भोपाल तक इसकी गूंज सुनाई दे रही है। इन दोनों मामलों से भाजपा सरकार के मंत्री अनूप मिश्रा के राजनीतिक जीवन पर दाग लगने की बातें सभी कह रहे हैं लेकिन खुलकर अभी-भी कोई बोलने को तैयार नहीं है। उनके बेटे अश्विनी, दो भाई अजय-अभय और ममेरे भाई दीपक बाजपेयी पर हत्या, हत्या का प्रयास और बलवे का प्रकरण दर्ज हो चुका है। मंत्री रहते उनकी सरकार के कार्यकाल में ही यह प्रकरण दर्ज होना उनके लिए सोचने की बात है क्योंकि बिना मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इच्छा और पार्टी हाईकमान की सहमति के यह दर्ज हो नहीं सकता। देखना यह है कि इतना सब होने के बाद उनकी आंखें कब खुलेंगी। इसका शायद जनता को इंतजार है।
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