शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

हजारों करोड़ों के नुकसान की बिना पर बंद क्यों...


अब जनता समझ गई है कि बंद आखिर क्यों होते हैं? उसने सवाल उठाना शुरू कर दिए हैं कि जब महंगाई का राजनीतिक विपक्षी पार्टियां विरोध करती हैं तो वे देश को और नुकसान क्यों पहुंचाती हैं। बंद से करीब 13000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यह राशि किसी छोटे राज्य के बजट के बराबर है जिससे उसकी सालभर की अर्थव्यवस्था का संतुलन बना रहता है। तेरह हजार करोड़ रुपए के नुकसान से क्या देश में महंगाई पर असर नहीं पड़ेगा। इस कारण कुछ महीनों बाद फिर कुछ प्रतिशत महंगाई बढ़ेगी और पुन: विपक्षी दल उसका विरोध करेंगे। फिर से हजारों करोड़ों रुपयों का नुकसान होगा। आखिर ऐसे बंद से जब देश को लगातार नुकसान हो रहा है तो महंगाई के विरोध का दूसरा गांधीगिरी का तरीका क्यों नहीं जनता को सुझाया जाता। यानी सरकारी कर्मचारी एक घंटे ज्यादा काम करें। नेता मंत्रियों और नीति निर्णायकों के बंगलों के सामने मुंह पर पट्टी बांधकर भूखे-प्यासे बैठे। व्यपारी विरोध के दिन गांधीगिरी के दूसरे तरीकों पर सोच-विचार कर अमल करे। महंगाई के विरोध के लिए देशभर के उद्योग धंधों, व्यापार, परिवहन साधनों को बंद कराना कहां का तरीका है। जब पता है कि इस विरोध से महंगाई और बढ़ेगी। आखिर इस विषय में नेताओं, असरदार लोगों, बुद्धिजीवियों को सोचना होगा। अन्यथा महंगाई के ऐसे विरोध से हम भी अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई को बढ़ाने में इसी तरह योगदान देते रहेंगे।

1 टिप्पणी:

  1. बंद का असर किस पर पड़ा। गरीबों पर या फिर रहीसों पर। जो इस महंगाई में पिस रहा है उस पर या फिर.......। बाजार बंद रहे। सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा। जिन लोगों ने दुकानें खोलीं भी उन्हें बंद करा दिया गया। क्यों? अरे भारत बंद है भई, तुम दुकान कैसे खोल सकते हो। अगर दुकान खोल ली तो बंद असफल नहीं हो जाएगा, विपक्ष का मखौल नहीं उड़ेगा। एक अदने से दुकानदार की वजह से पूरे विपक्ष के किए धरे पर पानी फिर जाए, ये कैसे हो सकता है।
    इस भारत बंद से क्या मिला। पेट्रोल, डीजल, कैरोसिन और पता नहीं किस किस के दाम कम हो गए क्या ? चलो नहीं भी हुए तो क्या आश्वासन ही मिला है कि सरकार दाम कम करने की कोशिश कर रही है, जल्द ही कीमतें काबू में आ जाएंगी। ऐसा कुछ नहीं हुआ। सरकार ने तो बंद के एक दिन पहले ही कह दिया था कि कीमतें किसी भी कीमत पर कम नहीं होंगी।
    फिर बंद का फायदा क्या? जिनके घर महीने भर का राशन एक ही दिन आ जाता है उन्हें तो कुछ फर्क नहीं पड़ा। फर्क उन्हें पड़ा जो रोज कमाई कर आटा, सब्जी और सरसों का तेल लेकर घर जाते हैं। आज न तो वे कमाई कर पाए और न ही घर जाते समय खाने का सामान ही ले जा पाए। असर उन ठेली वालों पर पड़ा जिनकी ठेली पर आज कोई नहीं आया। आए भी तो वही भारत के सबसे जिम्मेदार नागरिक। यह कहने की ठेली हटा लो, आज भारत बंद है। मना किया तो डरया धमकाया और सामना इधर उधर फेंक दिया।

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