

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस की विचारधारा आज भी लगभग वैसी है। इसमें समय के साथ उससे नई उम्र के लोगों के जुडऩे, समाज में आए बदलाव का कुछ हद तक प्रभाव पड़ा है। मगर फिर भी आज आरएसएस से सीधे जुड़े लोगों में अनुशासन और नैतिकता काफी मिलती है। वहीं दूसरी तरफ इसके अनुशांगिक संगठनों के मामले में बिलकुल इतर स्थिति है। उन पर समाज में आए बदलाव, नई उम्र के लोगों के जुडऩे और दूसरी विचारधारा के लोगों के उनसे जुडऩे का बहुत ज्यादा असर पड़ा है। सबसे ज्यादा असर भाजपा पर पड़ा है जिसमें नैतिकता और अनुशासन तो बचा ही नहीं है। आरएसएस के अनुशांगिक संगठनों में सबसे ज्यादा खराब हालत बजरंग दल की है। इसमें अनुशासन नाम की चीज शायद नहीं है। नेतृत्व की भी इसमें कोई नहीं सुनता। हर कहीं असामाजिक तत्वों जैसी हरकतें कर ये अपनी ही पार्टी की सरकारों के लिए कई बार मुसीबत खड़ी करते रहे हैं। इनकी छवि भी मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन सिमी जैसी बनने लगी थी जब इससे जुड़े कुछ नेताओं का नाम बम विस्फोटों में शामिल हुआ। हालांकि इसके बाद अब बजरंग दल का नाम ऐसे मामलों से दूर है। फिर बजरंग के नाम से व्यापारी, पुलिस और समाज का सभ्य वर्ग कुछ भय खाता है जो किसी भी संगठन के लिए अच्छी बात नहीं है। राजनीति में भाजपा भी आरएसएस विचारधारा के अनुरूप अपनी छवि को धीरे-धीरे खोती जा रही है। इसमें दूसरे दलों के खराब छवि वाले लोगों के लगातार प्रवेश करने से पार्टी की इमेज पर विपरीत असर पड़ा है। बाहुबलियों और अपराध के आरोपों से घिरे नेताओं के पार्टी में आने से भाजपा दूसरों से अलग दल की छवि को तोड़ती जा रही है। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अपने नेताओं को प्रश्रय दिए जाने के कई उदाहरण सामने आने के बाद भी पार्टी के सरकारें उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही हैं जिससे उनकी छवि आरएसएस के विपरीत बन रही है। अनुशासनहीनता की बात करें तो कोई भी मंत्री अपने ऊपर लगे आरोपों की सफाई के स्थान ढीटों की तरह इस्तीफा नहीं देने की बात करते हैं। और तो अपने वरिष्ठ नेताओं के नाम लेकर कहते हैं कि उन पर भी आरोप हैं वे क्यों पद से इस्तीफा नहीं देते। आज देश में राजनीतिक दलों की स्थिति यह है कि सभी एकधारा में बह रहे हैं। भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार बन गया है। अपनों से बड़ों का सम्मान नहीं करना, अनुशासन की रेखा के भीतर आ गया है। यह सब चापलुसी, अपनी रेखा बड़ी करने के स्थान पर दूसरी की काटने की प्रवृत्ति वाले लोगों को बढ़ावा मिलने से हुआ है। ऐसे लोगों से भाजपा जैसे दलों को बचना होगा क्योंकि वह दूसरे राजनीतिक दलों से स्वयं को अलग होने का दावा करते हैं।
wah sir jee, bada zordar likha hai. blog dekh kar bahut achchha laga
जवाब देंहटाएंratnakar
ब्लागिंग की दुनिया में आपका स्वागत है. आपकी अभिव्यक्ति की शैली प्रभावकारी है.लेकिन आपके ब्लाग में बैकग्राउंड इमेज पर व्हाइट कलर का फांट पढ़ना काफी मुश्किल काम है। कृपया इसे सुधार लें...
जवाब देंहटाएं--
इंटरनेट के जरिए अतिरिक्त आमदनी के इच्छुक साथी यहां पधारें - http://gharkibaaten.blogspot.com
भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अपने नेताओं को प्रश्रय दिए जाने के कई उदाहरण सामने आने के बाद भी पार्टी के सरकारें उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रही हैं जिससे उनकी छवि आरएसएस के विपरीत बन रही है। अनुशासनहीनता की बात करें तो कोई भी मंत्री अपने ऊपर लगे आरोपों की सफाई के स्थान ढीटों की तरह इस्तीफा नहीं देने की बात करते हैं। और तो अपने वरिष्ठ नेताओं के नाम लेकर कहते हैं कि उन पर भी आरोप हैं वे क्यों पद से इस्तीफा नहीं देते।
जवाब देंहटाएंउक्त हालत हर दल में हैं और हर एक जैसा है! चाहो तो इसे मजबूरी कहो या नाटकबाजी!
agree with u
जवाब देंहटाएंआप की रचना प्रशंसा के योग्य है . आशा है आप अपने विचारो से हिंदी जगत को बहुत आगे ले जायंगे
जवाब देंहटाएंलिखते रहिये
चिटठा जगत मे आप का स्वागत है
गार्गी
बड़ी ही बुलन्द स्वर और सशक्त वाणी में आपने लिखा है.
जवाब देंहटाएंआपके विचारों से मैं सहमत हूँ कि बजरंग दल को अपनी सीमायें पहचाननी होंगी, तभी राष्ट्र का विकास हो सकेगा.