शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

इनकी कौन सुनेगा...!

आजादी दिलाने वाले बुजुर्ग हो चुके स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपने आपको मिलने वाली राशि के नाम परिवर्तन के लिए छह दशक से चिल्ला रहे हैं लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। जनप्रतिनिधि सांसद, विधायक, पार्षद सभी अपने मानदेय को बढ़ाने के लिए खुद ही निर्णय ले लेते हैं मगर गुलाम देश में अंग्रेजों का जुल्म सहने व गुलामी से मुक्ति दिलाने वालों के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं। इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सालाना जो राशि मिलती है वह भी बेहद कम है जो न्यूनतम कलेक्टर द्वारा निर्धारित मजदूरी दर के आसपास है। जबकि एक सांसद अपना वेतन सालाना 10 लाख रुपए तक करा रहा है तो विधायक और पार्षद भी दिन ब दिन वेतन को बढ़ाए जा रहे हैं। आजाद के लिए जुझने वाले हमारे बुजुर्ग हो चुके स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए आखिर अब कौन आवाज  उठाएगा? जबकि इन संख्या आज बहुत कम हो चुकी है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. अपना पेट भरने से फुरसत मिले तो किसी और की सोचें............... और हां इस काम में कोई कमीशन भी तो नहीं बनता न, फिर नेता बिना कमीशन का काम कैसे कर सकते हैं?

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  2. बढ़िया...भ्रष्ट लोकतंत्र के एक और स्वतंत्रतादिवस की अग्रिम शुभकामनाएं

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